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परिंदों सी हो आज़ादी

                
                                                         
                            सारी बंदिश इंसानों ने बनाई
                                                                 
                            
और खुद उसमें फंस गया
सीमा रेखा भी खुद बनाई
और खुद उसमें सिमट गया
बंधन में बांधना दायरों में कैद करना
ये भी इंसानी फितरत है
कभी कभी ज़मीर मेरा कचोटता है मुझे
बनाने वाले ने , तो हम इंसानों को
दी थी परिंदों सी आज़ादी
फिर क्यों हम सब भूल गए
जाने कितनी जंजीरों में खुद को जकड़
रखा है खुद हमने ।
तेरा -- मेरा , कह कर आपस में भी लड़े
देश - विदेश भी हमेशा यूं ही टकराते रहे
आज सुधार होगा या कल सुधार होगा
या शायद कभी नहीं सुलझेगा ये मसला
न मन से होगा मन का मेल
बस कहते रह जाएंगे , कि
परिंदों सी हो आज़ादी ।
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8 महीने पहले

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