निर्लज्ज आँसू बहते है
जाने क्यूँ हम उनकी
निर्लज्जता सहते है !
लाख छिपाए होठों पे
मुस्कान लाके
पर ये भेद सारा
हृदय बसी पीढ़ा के
खोल देते है !
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