ये दिन के उजाले , हर इक के नसीब में रौशनी
बन के प्रकाशित नहीं होते है !
इनके लिए दिन का मतलब , काम और जिम्मेदारी
रात की चांदनी भी हसीन ख्वाब बन के इन की
आंखों में नहीं समाती , इक बैचेनी के आलम में इनकी रात गुजरती है!
ये वो मजदूर हैं , किसान है , गली -- नुक्कड़ पर
अपना सामान बेचने वाले है !
जिनकी बनाई हुई बड़ी से बड़ी इमारतों में
आराम फरमाते रईस जादे , अपनी गोदाम को इनकी
मेहनत खून पसीने से सिंची गई अनाजों से भरते है ,
वहीं कम कीमत के सामानों को ओर भी मोल भाव कर इनसे खरीद कर दो चार रुपए बचा कर शान से बड़ी -- बाद गाड़ियों में घूमते है !!
इनके हिस्से में न दिन के उजाले न रात की चांदनी आती हैं !!
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