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मैं भी गया शिवालय

                
                                                         
                            ज़िंदगी बेवफा तू क्यूँ है
                                                                 
                            
मौत ही महबूबा कहलाती क्यूँ है
कहते हैं कि झूठे का मुँह काला
पर सत्य ही कटघरे में हो
कर खड़ा पिसता क्यूँ है
दौर चाहे कोई भी हो
हर दौर में महिला का अस्तित्व ही
अग्नि परीक्षा से गुजरता क्यूँ है
किसी को ज़िंदगी के ऐश तो
किसी की ज़िंदगी को नरक
तू ख़ुदा बनाता क्यूँ है
मेरे प्रश्नों के उत्तर समाज के पास नहीं होगे
तेरे दर पे भी जैसे पत्थर से टकरा कर
लहू बहाता लौटता मेरा वजूद क्यूँ है
महाशिवरात्रि का पावन पर्व है
मैं भी गया शिवालय
पर मेरी आत्मा को वहां भी
मिला नहीं सुकून क्यूँ है
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6 महीने पहले

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