कुछ कर गुजरने की चाह कितनो की !
जन्मी और बचपन में पली बढ़ी !
पल बढ़ के जावन हो गई !
कितनों की चाह को मक़ाम हासिल हुआ !!
कितनों के अरमानों का कत्ल हुआ !
कितनों की ख्वाहिशों ने दम तोड़ा !
कितनों की चाह को मक़ाम हासिल हुआ !!
कितनों की चाह की उमर उस पड़ाव में है !
जहां हसरतों की सीढ़ी चढ़ना मुमकिन ही नहीं !
कौन आखिर कौन जिम्मेदार था !
गरीबी , सिस्टम , रीति रिवाज , दिशा विहिन ता
मजबूरी , जिम्मेदारी !
जाने कितने अनगिनत लोग !
जिनकी चाह को मक़ाम हासिल नहीं होता !!
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