आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कितनों की चाह को मक़ाम हासिल हुआ

                
                                                         
                            कुछ कर गुजरने की चाह कितनो की !
                                                                 
                            
जन्मी और बचपन में पली बढ़ी !
पल बढ़ के जावन हो गई !
कितनों की चाह को मक़ाम हासिल हुआ !!
कितनों के अरमानों का कत्ल हुआ !
कितनों की ख्वाहिशों ने दम तोड़ा !
कितनों की चाह को मक़ाम हासिल हुआ !!
कितनों की चाह की उमर उस पड़ाव में है !
जहां हसरतों की सीढ़ी चढ़ना मुमकिन ही नहीं !
कौन आखिर कौन जिम्मेदार था !
गरीबी , सिस्टम , रीति रिवाज , दिशा विहिन ता
मजबूरी , जिम्मेदारी !
जाने कितने अनगिनत लोग !
जिनकी चाह को मक़ाम हासिल नहीं होता !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर