साल बदलने से मुकद्दर नहीं बदलता
किसी ने क्या खूब कहा और सच ही कहा
झुग्गी झोपड़ियों के हालात नहीं बदलते
देश में फैली भ्रष्टाचारी नहीं बदलती
मिलावटखोरी नहीं बदलती
शराब , जूते - चप्पलों के शो रूम का चमचमाना
नहीं बदलता
पुस्तकों -- किताबों का फुटपाथों में बिकना
बंद नहीं होता
मजबूरी , लाचारी , जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
आशाएं , ख्वाहिशें अधूरे सपने भी इनके भार
से दिल में ही दबे रह जाते है
तिजोरी भरती व्यापारियों की , किसान की
भुखमरी नहीं बदलती
कुछ बदलता हे तो वो सिर्फ साल
साल बदलने से मुकद्दर नहीं बदलता !!
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