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खुद को खुद पढ़ती हूं जब

                
                                                         
                            खुद को खुद पढ़ती हूं जब शून्य अवलोकन
                                                                 
                            
पाती हूं ।
संतुष्टि के क्षीर सागर से आधी गगरी भी
भर नहीं पाती हूं
अनंत क्षितिज में उड़ने की महत्वाकांक्षा
करती हूं तब बार --बार गिर जाती हूं
मेरे नभ में सूरज उगने की पूर्व की लालिमा
भी किंचित मात्र नज़र आती हैं
चांद की चमक भी अमावस की रात हो वैसे
छिप -- छिप जाती हैं
पर मै थकी नहीं न ही हारी हूं
मंद गति से निरंतर बढ़ते हुए
कामयाबी के विश्वास का दामन थामी हूं
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7 महीने पहले

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