व्यथित विचलित करती मुझको तेरी प्रीत
कासे कहूं मन की पीर
ढांढस बांधू खुद को खुद ही
पर कैसे छिपाऊं अंखियों के नीर
कासे कहूं मन की पीर
हृदय जमीं थार मरुस्थल जैसी तेरी
काहे नहीं जाए पसीज
कासे कहूं मन की पीर
तनहा छोड़ के मोहे तुम जश्न मनाओ जाके भीड़
कासे कहूं मन की पीर ।
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