एक हमारे मित्र ने इक
करुण गाथा लिखी
जिसे पढ़ के आंख हुई नम
इक सवाल उभरा मन में
आत्म हत्या कोई भी
इंसान तब तक नहीं
करता जब तक
उसे ये न लगे
कि उसके लिए
ज़िंदगी के सारे रस्ते बंद है
जाने कैसे वो अपना हृदय
पक्का करता होगा जब वो
अकेला या सा परिवार आत्म हत्या करता होगा
क्या हमारे समाज में या हमारे संविधान में
ऐसा कोई प्रावधान होना नहीं चाहिए
कि इस परिस्थिति से गुजरते हुए लोगों
की सुनवाई हो , या उन्हें आत्म हत्या की
सामाजिक कानूनी अनुमति हो
ताकि या तो उनकी समस्या का समाधान
निकल जाए या उन्हें भी इसकी अनुमति मिल जाए ।
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