हे धारा मुझे भी पता बता दो
हे पवन मुझे भी वो राह दिखा दो
हे सूरज थोड़ी ही सी वो तपिश मुझ में
भी जगा दो
हे चांद मेरे तन के ज़र्रे ज़र्रे में अपनी चांदनी
बिखरा दो
हे पर्वत मुझ में भी खुद सा तुम वो उच्चत्व बढ़ा दो
हे सागर तुम्हारी गहराइयों में छिपा हे अगर अल्फाजों का वो खजाना तो थोड़ा ही सही मेरा दामन भी
दमका दो
जो अगर ये खजाना मेरी रूह में बसा हो तो
मुझ भी ये एहसास करा दो
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