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कदम बढ़ाऊं किस पथ पे ।

                
                                                         
                            मैं भी तुझ पे यक़ीन करना चाहती हूं
                                                                 
                            
तू पत्थरों में बसता है या जल के कलरव
में झलकता है ।
तू हवाओ में बहता है या बसंत बहार में थिरकता है।
तू ज्वाला बन धधकता है या ओस की बूंदों में
ठहरता है ।
तू किस रूप में किस रंग में ढलता है
हर कण में हर तरंग में तेरा अस्तित्व उभरता है
पर में कैसे करूं तुझ पे यक़ीन
मुझे मेरे साये के अलावा क्यों कोई
मेरे साथ नहीं तू भी नहीं दिखता है
कदम बढ़ाऊं किस पथ पे जब तू भी
मेरा हाथ नहीं पकड़ता है।
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2 घंटे पहले

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