मन में कुछ चलता है
जुबां पे कोई ओर बात होती हैं
रिश्ते नाते सब धरे के धरे रह जाते है
मंजिल का पता ठिकाना नहीं होता
राहें भी नहीं आसान होती हैं
जिंदगी जब इम्तिहान लेती हैं।
तब सोचता हे इंसान कहां गलती हुई
भटकता है दर बा दर
घूमता है मंदिर , मस्जिद
थोड़ी तसल्ली दे देते हे , बाबा फ़कीर
पर खो जाता हे चैन सुकून
जिंदगी जब इम्तिहान लेती हैं।
नहीं देखती है ये अमीर गरीब
कोई जाति कोई पाती नहीं इसके अज़ीज़
सबको तौलती है इक तराजू में
जिंदगी जब इम्तिहान लेती हैं।
-अनामिका .....
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