गुमनाम हूं मैं , क्योंकि चमक के इस दौर में
मै चमकीली न बन सकीं , लिपटी हुई है आज भी
मुझ में वही पुरानी साधारण शख्सियत
जो किसी महफ़िल में चर्चा का विषय
बनने के लिए लालायित भी नहीं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X