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हृदय पुष्प करती हूं अर्पण

                
                                                         
                            मेरी सोच से भी दुनियां गोल है
                                                                 
                            
जहां देखो वहां पोल है
प्यार मुहब्बत सिर्फ शब्दों में
दिखते हैं
नफ़रत इर्ष्या जलन के
वजूद भारी है
सब को खबर सबको पता है
कि न लेके आए न लेके जा पाएंगे
फिर भी धन - दौलत इत्यादि
जोड़ने की होड़ है
मानुष रह गए मनुष्यता को
बेंच कर
सब कुछ देख ईश्वर भी तंग आ गया
चला गया , अपने धाम , इंसानों को उनके
हाल में छोड़ कर
तभी मंदिरों में भी अब
पहले जैसी शांति मिलती नहीं
जाने कब फिर ईश्वर नव रूप धर
आयेंगे
भ्रष्ट जन और सारी बुराइयों का
समाप्त कर पुनः नव युग का
निर्माण करेंगे , सत्य विजयी होगा
सनातन धर्म विकसित होगा
सच्चे , अच्छे मानव का समाज का
कल्याण होगा
इसी कामना से हे प्रभु आपको
हृदय पुष्प करती हूं अर्पण
सुन लो मेरी पुकार आपके
श्री चरणों में किया मैने अपना
समर्पण ।।
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5 महीने पहले

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