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हद लिखूं

                
                                                         
                            फिर से विरंगी का आलम इक तेरे जाने के बाद
                                                                 
                            
ढूंढा था चाराग़ लेके मगर हासिल न हुआ
रौशनी का सुराग !!
फिर अजनबी सा शामिल हुआ महफ़िल में
मेरा भी नाम
शराब हलक से उतार के भी , दर्द - ए - दिल
तुझे बहलाने में , मै रहा नाकाम !!
नैनो से छलक न जाए अश्क कहीं
चला चल दिल तू लेके मुझे , हो जाऊं
फिर से गुमनाम !!
ये मेरी हद है हद है मेरी , खामोशियों से
सि जाऊंगी हर इक ज़ख्म दिल
न लगाऊंगी किसी पे कोई इल्ज़ाम !!
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7 महीने पहले

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