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ग़ज़ल ऐ अनामिका

                
                                                         
                            पत्थर सा बन गया हूं , ..
                                                                 
                            
तू मुझमें फिर से एहसास जगा दे ..ये
खो ना जाऊ दुनिया की भीड़ में
खुद में मुझे ऐसे समा ले ...ये
टूट के ज़र्रा ज़र्रा सा बिखर गया हूं , ..
हो सके तो समेट कर , मुझे अपना बना ले ... ये
बेइंतहा इम्तिहान दे चुका हूं , ..
चाहे तो तू भी मुझे अज़मले ...ये
शिद्दत से हे ये पुकार मेरी ....
शिद्दत से हे ये पुकार मेरी ...
ये मोहब्बत मुझे मेरी मुहब्बत की बांहों में पनाह दे

हे....ये
-अनामिका
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10 महीने पहले

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