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फूल की अभिलाषा नहीं बदली

                
                                                         
                            मेरी ख्वाहिश की ज़रा भी परवाह होती
                                                                 
                            
तो हे माली , तुम मुझे बाग में
मुझे तोड़ने से पहले मुझसे मेरी रज़ा पूछ लेते
न सजने देते तुम मुझे गुलदस्ते में
न बिछने देते मखमली बिछौने में
मैने कब गुहार की तुमसे कि तुम
मुझे किसी सुंदरी के गेसुओं में सजाओ
कब कहा मैने तुमसे कि मुझे किसके
जन्मदिवस का हिस्सा बनाओ
मेरी मर्जी किसी शोरूम , मॉल किसी पार्टी
की रौनक बढ़ाने की नहीं थी कभी
मेरी अभिलाषा जैसे कल थी
आज भी है वहीं कि हे माली
तुम मुझको देना वही फेंक
जिस पथ से जाते हो
देश के वीर सिपाही अनेक !!
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8 महीने पहले

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