भीड़ में भी तन्हाई है
महफ़िल में भी साथ सिर्फ
परछाई है !
मेरे , ख़ुदा की ये नवाजिश है
मुझ पर , गैर इंसानों से फिर
शिकायत कैसी !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X