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दुनियां हरी भी पतझड़ भी

                
                                                         
                            चाहने से होता है क्या , मिलता वही है
                                                                 
                            
जो होता नसीबा
कुछ लोग मेरी इस बात पर ये सवाल करेंगे
की हमने तो अपने दम पे जहां अपना खड़ा किया
तुम हो कायर जो ये बात करते हो
शायद वो कुछ हद तक सही भी हो
पर लोग पड़े हैं ऐसे भी
जिन्हें ज़िंदगी ने न जीने दिया न मारने भी
उनकी रोज सुबह होती है
चाह लिए कुछ कर गुजरने की
रात आते आते सांसे दम तोड़ देती है
उनके हौसलों की
ये बात सारी हकीकत है
दुनियां बस नहीं है हरी हरी
कहीं खुशियों के अंबार है
तो कहीं पतझड़ के नज़ारे है
कोई मुस्कुराता है सच में तो कोई
अश्क छिपाता है
दुनियां वैसी नहीं हर किसी की
जैसा वो बतलाता है !!
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6 महीने पहले

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