दो पल जो मै हंसती हूं सहेज कर समेट कर
अपनी हंसी रखती हूं
ना जाने तीसरे पल ये हंसी हासिल हो न हो
जो रिश्ता जीती हूं
उन रिश्तों की यादों को भी बुन लेती हूं मैं
जाने किस पल में ये रिश्ता हो न हो
हो न हो आ आ आ आ
दो पल दे - दे मुझे भी ज़िंदगी
थोड़ी सी जमीं दे थोड़ा सा आसमा दे
इक प्यार सा घर हो वहां जहां मैं ,
रानी की तरह रहूं । आसमा में अपने
ख्वाबों में ही सही परी की तरह वहां सैर करूं
दो पल दे - दे मुझे भी ज़िंदगी l
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