बस यही सवाल उभरता है
मेरे जेहन में बार बार
जिन्हें ज़िंदगी मन की नसीब नहीं होती
मौत भी उनके करीब नहीं होती
जो लड़ता है , ज़िंदगी में खुद से
ज़माने से , ख़ुदा की पनाह भी
उसे नसीब नहीं होती
लेता है इम्तिहान ईश्वर भी उन्हीं के
सह नहीं पाते है जो सितम तक़दीर के
ये काल चक्र भी समझ नहीं आता है
कर्मठ , अच्छी सीरत , नेक ईमानदार इंसान
ही कर्म भट्टी में पिसता हुआ नज़र आता है
बेईमान , भ्रष्टाचारी , मक्कारी करनी वाला
शानो शौकत से ज़िंदगी बिताता है
ये सब देख के बस यही सवाल उभरता है
मेरे जेहन में बार बार कर्मों का ये है , कैसा विधान !!
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