हृदय की इस सुन्दर बगिया मेें
पंछी करती किलकारी है,
सारे जग में मुझे कुछ नहीं
तेरी सूरत प्यारी हैं,
चाहू यादों के पटल पर,
स्मृति सिर्फ अब तेरी हो
तुम जान थी, जान रहोगी
और जान सिर्फ मेरी हो ||
रहती मुझसे नाराज़
क्या किया सोचता हूं आज,
बहुत हुआ प्रत्यक्ष करो अब
खोल दो सारे राज़,
इल्ज़ाम लगाऊंगा ख़ुद पर,
चाहें गलती वो तेरी हो
तुम जान थी, जान रहोगी
और जान सिर्फ मेरी हो ||
घिरा हुआ हूं प्रेम के जाल से
पूछती क्यों हाल विशाल से,
तुम इठलाती केसरिया हो
मेरा सारा देव-रिया हो,
किन्तु,
हटाओ आकर काले बादल,
दूर करो छाई है अंधियारी जो
तुम जान थी, जान रहोगी
और जान सिर्फ मेरी हो,
तुम जान थी, जान रहोगी
और जान सिर्फ मेरी हो ||
विशाल सिंह
जीएलए यूनिवर्सिटी
मथुरा
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X