'इकलौती लकीर'
तू मेरे जीवन की वह अनकही, निःशब्द मोहब्बत है,
तेरा ज़िक्र कहीं छिड़ जाए तो धड़कन रुक जाती है।
मेरा इलाज तो सखी! महज़ तेरे ख़यालों से चलता है,
हकीम तो नब्ज़ टटोल कर मायूसी से निकल पड़ता है।
तुझसे कीं चंद बातों से मेरा कई दिन गुज़ारा होता है,
गुमराह मन भी मेरा, फिर रोम-रोम सँवर जाता है।
मेरे इश्क़ की कोई मंज़िल नहीं, बस चाह बेपनाह सी है,
तू दुनिया भी उजाड़ दे गर, तुझे मनमानी की इजाज़त है।
जीवन की पूरी किताब में लकीर तेरे नाम के नीचे ही खींची है,
पन्ना-पन्ना मुक्त है उसका, बस वो इकलौती लकीर ही निजी है।
उम्मीद नहीं रखी प्रेम में, बस एक दिन पतझड़ होना तय है,
तेरे इंतज़ार का मेरी आत्मा के सिवा कोई चश्मदीद नहीं है।
मेरी कविताओं का शब्द-शब्द तू है, हर भावुक लहजा तू है,
क्योंकि तू मेरे जीवन की वह अनकही, निःशब्द मोहब्बत है।
-अमोल हरिदास.
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