जा ना..
निकल घर से
एक दिन सुबह सुबह
बिना बताए किसी को
जा
दूर के जंगल की ऊंची पहाड़ी
पर बैठ
देख
उगते हुए सूरज को
मुस्कुरा
इतरा
अंगड़ा
इठला
सीख
चीर कर तिमिर को
उदय होना किसे कहते हैं...
जा ना
बिन कहे किसी को
तपती दोपहरी में
दबे पांव निकल घर से
जा
किसी खेत में
पेड़ देख नीम का
सो जा
बिछा के गमछा
लेट
लोट
उठ
बैठ
टहल
सीख
धरती की कोख से प्रकृति का
अंकुर किसे कहते हैं
जा ना
कूद जा डोली
शाम को सीना जोरी से
क्यों बताना किसी को
जा
किसी कोठे पर
टिका पिछवाड़ा
सुन
देख
गड़ा
आंखें
खोल
कान
सीख
बदनामी के डेरों में
पाक़ीज़गी किसे कहते हैं
जा ना
फलांग दे दहलीज
रात को एक रोज
देखने दे पड़ोसी को बालकनी से
क्यों फिकर किसी की
जा
किसी मयखाने में
पसर जा
जब तक जी चाहे
पी
जी
रो
हंस
चिल्ला
दुबक
सीख
बोतल के बुलबुलों में
ग़म कैसे भुलाते हैं
जा ना
चला जा
इससे पहले कि
जा न सके
आज तो जा
जा
चला जा....
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