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मुक्तक और कविता

                
                                                         
                            हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं
                                                                 
                            
जिद्दी हम भी कि लड़ते जा रहे हैं।।

हिंदी है पहचान हमारी
हिंदी है स्वाभिमान
हिंदी बांँधे एक डोर में
सारा हिंदुस्तान।

अब बेवजह बात बढ़ाता नहीं हूँ
किसी की जिंदगी में टांग अडा़ता नहीं हूँ
जी हमने भी सीख लिया है जीने का हुनर
किसी के प्यार के लिए अब गिड़गिड़ाता नहीं हूँ

शराफत से ना मिली तो चुराकर लूंगा
गुनाहों का बदला मुस्कुरा कर लूंगा।।

ईद भी तुम मेरी दीवाली भी तुम हो
गीत भी तुम मेरी क़व्वाली भी तुम हो
होंठों से हरदम लगाऊँ जिसे मैं
सुधा से लबालब वो प्याली भी तुम हो ।

बेखुदी की एक शाम रहने दो
कहानी वही गुमनाम रहने दो
ये आँखें ये खुले केश
और तेरे अधरों का ज़ाम रहने दो।

तुम रूठो ना, मैं मनाना चाहता हूंँ
यह सौभाग्य मैं पाना चाहता हूंँ।।

तेरी सादगी पर मैं एक बार फिर से मौन हूँ
इन नैनों से तुम्हीं कहो ना , मैं तेरा कौन हूँ।

तुझको पूजुँ या तुझसे प्यार करूँ?
लिख दूँ ग़ज़ल या इज़हार करूँ?

यूँ निहारो ना इन खूबसूरत निगाहों से
दिल बच्चा है, इसे बच्चा ही रहने दो।


वही नजर हैं वही अधर हैं
हर तस्वीर में मौन है वो
वही जगह है वही कहानी
कैसे कहें कि कौन है वो।

हम माटी के लाल हैं
कुम्हार हैं
माटी से जुड़ेगें
हम पढे़ेंगे लिखेंगे
और आसमान में भी उडे़ेंगे ।।

कलम छोड़कर बंदूक थामों तो माताएं सिसकेंगी
पढ़ लिखकर गर प्रश्न करो तो पीठ लाठियां बरसेगी।।
लाठियां क्या गोलियां चला लो, हम तनिक डरेंगे नहीं
मर के भी हमारे वज्र से हौसले ये कभी मरेंगे नहीं ।।

सोचते हैं नहीं एक क्षण के लिए
छोड़ देते हैं तन जो वतन के लिए
मैं तो करता नमन बस उसे ही यहांँ
जो चुनते हैं तिरंगा कफ़न के लिए।

हो गया हूँ बेघर डूब गया सब शहर
कोई बच न सका ये तेरा कैसा कहर
त्राहि त्राहि मची व्यूह कैसी रची
हे रचनाकर बता चाल कैसी चली।

अपनों के इस शहर में किसी ने अपनाया नहीं
मेरे मौत पर भी मुझे दफनाया नहीं।

कहीं ये मेरा सब्र न डोले
कह दो कोई कब्र न टटोले

राजनीति के मैदानों में जाने कैसा खेल हो रहा
धर्मयुद्ध में मरने वालों को भी देखो जेल हो रहा।

ईश्वर जब तक किसी दुराचारी को दंड देते हैं
तब तक वह कितनों का जीवन बर्बाद कर चुका होता है



किसको अपना दर्द सुनाएंँ
कौन हमारी फ़िक्र करे
सबने मेरे घाव कुरेदे
किसका किसका ज़िक्र करें।

दर्द से दर्द को यूँ ना जोड़ा करो
बेवजह दिल किसी का ना तोड़ा करो
छोड़ना ही तो है एक दिन ये जहां
मौत से पहले मुझको ना छोड़ा करो।

बेखुदी में ख़ुदा से नहीं वास्ता
अब शराबों से ही है मेरा वास्ता
तुम थी संग में, तो संग था ये सारा जहां
तुम नहीं तो जमाने से क्या वास्ता।

रहेगी इंतजार तेरे रूह की
रूप बिन गुजार लेंगे
रात तक, जन्म तक
हम युग तक गुजार लेंगे।

क्यों मिली मुझको ऐसे वज़ह तो बता
हाल ऐसा भी होगा, मैं सोचा ना था
आ के लग जा गले या तू दे दे ज़हर
अब ये यादों के जरिए ना इतना सता।

दुआओं में वो मुझको शाप दे गये
दिल्लगी की सजा बेबाक दे गये
अरमां था बन के रहूंँगा मैं सिंदूर
पर बंद एक कीये में वो राख दे गये।

तबियत कैसे सुधारें
मेरी दवा खुद बीमार है

ना बचपना जिया, ना जवानी जिया
मैं जन्मा और बूढ़ा हो गया।

जो सब्र करना जानता था
जमाने ने उसे और सब्र करना सिखाया
जो हठी था उसने जमाना बटोर लिया।

मशवरे न दो, रहने दो
ये आंँसू वफादारी के हैं
इन्हें बहने दो।

परिस्थिति मनुष्य को कुछ भी करने पर विवश कर देती
है।

*अपनी मुस्कुराहट को संभाले रखना,सबसे बड़ी कारीगरी है।

"ख़ामोशी" इंसान की कमज़ोरी नहीं, मजबूरी होती है।

मेरी जिंदगी में ज़हर घोलने वाले, मेरे ज़हर से अभी तू वाक़िफ नहीं।

बुद्धिमान व्यक्ति धोखे खाने से टूटते नहीं,
बल्कि वे और भी मजबूत बन जाते हैं।

दिल में रखते हो तो, दिल में कोई बात मत रखना।

मेरा दिल अब मुझे लौटा दो
खेलने के लिए किसी और को देना है।

मेरे एहसासों के आलिंगन से ही तृप्त हो जाना
बाहों के आलिंगन में पाबंदियां बहुत है।

मेरी परछाई भी मेरा साथ छोड़ गई
पर मेरे अनुभव ने मुझे कभी धोखा नहीं दिया।

हर रोज़ ख्वाबों में आती है
फिर कैसे कह दूँ कि वो भूल गई।

लाज़मी है
तेरे ख्यालों में, मैं बार-बार आता हूंँ
अफ़सोस कि
तुम मेरे ख्यालों से एक पल के लिए भी नहीं जाती।

मैं तो हार गया, लेकिन मेरे अनुभव नहीं हारे
उन्हें पता है तुम एक दिन जरूर लौट कर आओगे।

दिमाग के पास तो दिमाग होता है
कमबख़्त, इस दिल के पास ही दिमाग नहीं होता।


ये बोझ और उलझनें थोडे़ कम कर दे खुदा
घर की जिम्मेदारियों ने मुझे बूढ़ा बना दिया।

यादें ताज़ा कर गई तेरी हमशक्ल ने
आज भी रूलाया, बीते उस कल ने।

टूटकर चाहा तुझे, इसलिए टूट गया।

पता था मुझे, ये होना ही था
उम्र भर उसकी यादों में रोना ही था।

जो कहते थे हम किसी से expectation नहीं रखते
मेरा दिल उसी से उम्मीद कर बैठा।

मशहूर हो गये इस वास्ते
कि तेरे इश्क़ में हम मजबुर हो गये थे।

जिसे बहुत जल्द समझ बैठा था "दुनिया"
वो भी "दुनिया" ही निकला!

दुनिया की शिकायत तुमसे करता था
अब तेरी शिकायत दुनिया को किस मुंह से करूँ।

मेरे चाहत की बगिया में तेरा ही बसेरा है
दिल को छोड़कर बाकी सब कुछ तेरा है।

ऐ ज़िन्दगी इस्तीफा दे दूँगा तेरी नौकरी को
मेरे मेहनत की वाजिब तनख्वाह नहीं मिली।

कवि होना कितने दुर्भाग्य की बात है ना
दर्द भी लिखो तो, लोग कविता समझकर
वाह-वाह करने लगते हैं।

मेरे सबसे अच्छे मित्र वे हैं, जो मेरी गलतियों को बताकर
मुझे सीखने का अवसर प्रदान करते हैं।

हम भले ही सो जाएँ
चिर निद्रा में,
हमारी पंक्तियांँ
तुम्हें जगाती रहेंगी।

 
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1 hour ago

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