मृत्यु अंत नहीं होती,
बस एक ख़ामोशी होती है—
उस कहानी के बाद,
जिसे हम उम्र भर
जीते हुए लिखते हैं।
जिसे हम अपना कहते हैं,
वो भी एक दिन
हाथों से रेत की तरह
फिसल जाता है,
और हम देखते रह जाते हैं—
अपनी ही मुट्ठी को खाली।
मृत्यु शायद
ज़िंदगी की सबसे सच्ची बात है,
क्योंकि यहाँ
न कोई झूठ साथ जाता है,
न कोई अहंकार,
न कोई रिश्ता।
सिर्फ़ कुछ यादें बचती हैं,
कुछ अधूरे शब्द,
और किसी की आँखों में
ठहरी हुई नमी।
अजीब है न—
ज़िंदगी भर हम
मृत्यु से भागते रहते हैं,
और मृत्यु हर पल
हमें समझाती रहती है
कि जीना क्या होता है।
शायद इसलिए
मृत्यु से डरना नहीं चाहिए,
बस इतना करना चाहिए—
जब आख़िरी साँस आए,
तो दिल ये कह सके—
“मैंने ज़िंदगी को
सिर्फ़ गुज़ारा नहीं,
मैंने उसे
पूरी तरह महसूस किया था।”
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