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कुछ-कुछ कसूर ऐसा है…

                
                                                         
                            कुछ-कुछ कसूर ऐसा है…
                                                                 
                            

तेरा शुरू कुछ ऐसा है,
जैसे मेरे हज़ूर जैसा है…

तू मुझमें है,
और मैं तुझमें—
ये रिश्ता भी कितना
बे-नाम, मगर मशहूर जैसा है…

तेरी खामोशी में
मेरी धड़कनों की आवाज़ मिलती है,
तेरी रूह में
मेरी रूह की कोई प्यास मिलती है…

तू दूर होकर भी
मेरे सबसे करीब रहता है,
मेरे हर टूटते ख्वाब को
फिर से जीने की वजह देता है…

न कोई दावा,
न कोई शर्त,
न कोई सवाल अधूरा है—
बस तुझसे जुड़ जाना ही
मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत नूर है…

शायद इसी को इश्क़ कहते हैं,
शायद इसी को रूह का सफ़र—
जहाँ मैं खुद को खोकर भी
तुझमें पा लेता हूँ हर पहर…

तू मेरी मंज़िल भी है,
तू ही मेरा रास्ता भी है,
मेरी हर साँस में
तेरा ही कोई वास्ता भी है…

और जो कुछ है हमारे बीच,
उसे शब्दों में कहना भी कहाँ ज़रूरी है—
तू मुझमें है,
मैं तुझमें हूँ…
बस इतना ही
मेरी रूह के लिए पूरा है।

शायद इसलिए
इस रिश्ते में कोई गुनाह नहीं,
फिर भी दिल कहता है—

कुछ-कुछ कसूर ऐसा है…
कि तेरा होना ही
मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत
सुकून और गुरूर जैसा है…!!
-आचार्य अमित
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एक घंटा पहले

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