कुछ एहबाब ऐसे हैं…
(एक एहसास… कुछ ख़्वाब…
और ज़िंदगी के नाम एक पैग़ाम)
कुछ निज़ाम ऐसे हैं,
मानो गुलाब जैसे हैं।
कुछ चेहरे किताब जैसे हैं,
कुछ ख़्वाब लाजवाब जैसे हैं।
कुछ एहतियात ज़रूरी है,
कुछ रिश्तों की मजबूरी है।
हर राज़ बयाँ हो लाज़िम नहीं,
कुछ बातों की ख़ामोशी ज़रूरी है।
दिल परिंदा है या पुलिंदा,
ये कहना बेहद मुश्किल है।
कभी उड़ने को बेताब रहे,
कभी यादों में शामिल है।
आँखों में जो बंद पड़े हैं,
वो ख़्वाब बड़े नायाब हैं।
कुछ दर्द छुपे हैं सीने में,
कुछ अरमान बेहिसाब हैं।
कुछ लोग दुआ के जैसे हैं,
कुछ साए वफ़ा के जैसे हैं।
कुछ राह दिखाते हैं बनकर दीप,
कुछ लोग ख़ुदा के जैसे हैं।
हर ठोकर एक सबक़ देती,
हर मुश्किल एक पैग़ाम है।
जो टूट के फिर से उठ जाए,
उसका जीना ही सलाम है।
न उम्मीदों को मरने दो,
न ख़्वाबों को बिखरने दो।
जो दिल में उजियारा रखते हैं,
उनको हर हाल में निखरने दो।
कुछ ख़्वाब इंक़लाब जैसे हैं,
कुछ जज़्बे आफ़ताब जैसे हैं।
कुछ रिश्ते रूह में बसते हैं,
कुछ एहबाब गुलाब जैसे हैं।
कुछ निज़ाम ऐसे हैं,
मानो गुलाब जैसे हैं…
जो दिल में उतरकर महक उठें,
वो एहसास बेहिसाब जैसे हैं।
-आचार्य अमित
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