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तेरे आस में बैठा हूँ, इक ज़माने से।

                
                                                         
                            तस्वीर से निकल आ, माँ, किसी बहाने से,
                                                                 
                            
तेरे आस में बैठा हूँ, इक ज़माने से।

दुख का ऐसा पहाड़ टूटा है,
जो अपना है, वही रूठा है,
अर्जी लगाए क्या इस ज़माने से?
तेरे आस में बैठा हूँ, इक ज़माने से।

किस गलती को तुमने दिल में रखा है?
देर क्यों लगाए रखा है?
मान जा, माँ, अब तो इस दीवाने से,
तेरे आस में बैठा हूँ, इक ज़माने से।

रोशनी सी इस घर में ले आ तू,
गले से अपने अब लगा जा तू,
दीए में लौ आ जाए तेरे आने से,
तेरे आस में बैठा हूँ, इक ज़माने से।
-अमित कुमार पांडेय
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2 घंटे पहले

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