गैरों के एहसान का ज़िक्र करूँ मैं,
तुम बात करो मेरे घर के घातों की।
मेरी हँसी उड़ाने वालों,
मैं परवाह नहीं करता बातों की।
तपते धूप का आदी हूँ मैं,
नहीं ज़रूरत बेबस बरसातों की।
मेरी हँसी उड़ाने वालों,
मैं परवाह नहीं करता बातों की।
सूरज के शोलों में चला अब तक,
अब ज़रूरत न रही चाँदनी रातों की।
मेरी हँसी उड़ाने वालों,
मैं परवाह नहीं करता बातों की।
मिलकर भी कभी मिल न सके,
क्या ज़रूरत थी ऐसी मुलाक़ातों की?
मेरी हँसी उड़ाने वालों,
मैं परवाह नहीं करता बातों की।
सिद्धान्तों की राहो पे चलता चला मैं,
ना गुलामी की हालातों की।
मेरी हँसी उड़ाने वालों,
मैं परवाह नहीं करता बातों की।
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