नदियों में जब सैलाब उठेगा,
इन्सान अपना बनाया घर खोएगा।
देख के अपनी मेहनत बर्बाद,
किसान कलेजा पीट-पीट रोएगा।
क्या उम्मीद थी जल का प्रखर स्रोत,
परिप्लवन का रूप धर नाश करेगा।
उस पर मेघ गरज-गरज कर, बरस-बरस कर,
फसलों का सत्यानाश करेगा।
आशाओं की फसल डूबी जब,
किसने सुनी उसके दिल की पुकार?
छुटे हुए हाथ, छूटे हुए साथ,
क्या फिर से थामेगा हल का भार?
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