आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हल का भार

                
                                                         
                            नदियों में जब सैलाब उठेगा,
                                                                 
                            
इन्सान अपना बनाया घर खोएगा।
देख के अपनी मेहनत बर्बाद,
किसान कलेजा पीट-पीट रोएगा।
क्या उम्मीद थी जल का प्रखर स्रोत,
परिप्लवन का रूप धर नाश करेगा।
उस पर मेघ गरज-गरज कर, बरस-बरस कर,
फसलों का सत्यानाश करेगा।
आशाओं की फसल डूबी जब,
किसने सुनी उसके दिल की पुकार?
छुटे हुए हाथ, छूटे हुए साथ,
क्या फिर से थामेगा हल का भार?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर