रात गुजर गई, हां गुज़ारी गई
याद आती रही, हाँ बिसराई गई
वो नहीं आया वादा करके
एक और भूल, हां भुलाई गई
मैने उसे मोहब्बत का खुदा समझा था
फिर क्या हुआ, हां खुदाई गई
मेरा होकर वो किसी और से मुब्तिला हुआ
तुम जो सोच रहे हो सही है, हां हयाई गई
जरूरत पड़ने पर दोस्त को न आजमाना
फिर कहोगे तुम बरसों की, हां आशनाई गई
वो क्या बिछड़े, ये हाल है इन दिनों
सावन मैं बारिश की बूंदों की दिलरुबाई गई
अब न जीने मैं मजा है, न पीने मैं
जाम भी छूटा, हाथ से सुराही गई
एक और ग़ज़ल लिख रहा हूँ इसलिए
बस इस तरह उसकी याद भुलाई गई
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X