मैं तुम्हारा क्या बनता?
आंसू, झरना या लहर?
क्यों कर पिघलता एक पर्वत,
क्या तुम्हारे क्षोभ का कारण,
उसकी विवशता?
उसकी कठोरता?
चंचल नदी तुम किसी के आंसू हो,
पर्वत के ठंडे आंसू,
नदी तुम बहता जीवन बनना,
सभ्यताओं को सींचना,
जंगलों, खेत-खलिहानों में बहना।
नदी तुम उन्मुक्त निकलना,
समंदर से मिलने को,
मेरे टुकड़ों को रौंदते हुए।
तुम नहीं बहना, लौट आने को,
मुझ निर्जीव पर्वत की ओर।
लौटना प्रकृति का नियम नहीं,
मुझसे दूर जाकर तुम सृजन बनना,
तुम्हारी पवित्रता को दूर से निहारता,
सप्रेम तुम्हारा! अभिशप्त पर्वत।।
-अमरनाथ मिश्र
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