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अदम्य शौर्य

                
                                                         
                            स्वर कहीं कंपित नहीं जो वीर है डरते नहीं।
                                                                 
                            
तलवार लेकर खींच दे वह लालिमा मिटती नहीं।
वह त्याग बल तप तेज उनकी कीर्ति है घटती नहीं
स्वर कहीं कंपित नहीं जो वीर है डरते नहीं।

हो कुपित ललकार दे, तो सुर्य रथ रुकता वही ।
राम धनु टंकार दे ब्रह्मांड भू-लुंठित वही।
है वीर का परिचय यही अभिमान वह करते नहीं ।
स्वर कहीं कंपित नहीं जो वीर है डरते नहीं।

कायर, गरजते जोर में चुपचाप तो बलवान है।
वीर के वीरत्व की पहचान रण मैदान है।
सर कटा खंडित हुए हम, सर लीए झुकते नहीं।
स्वर कहीं कंपित नहीं जो वीर है मरते नहीं।

विघ्नों को जिसने चूम कर,माथे लगाए झूमकर।
उसके इशारों में ही,यह धरती चलेगी घूमकर।
जब तेज के प्रलय घनौर राह में निकल पड़े।
वह नख नाखानों से उखड़े पर्वतों को ले उड़े।

-अमरनाथ जायसवाल
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2 वर्ष पहले

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