आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

समय और सपना -अमर त्रिपाठी

                
                                                         
                            कल भी तरसता था, आज भी तरसता हूँ,
                                                                 
                            
कल छोटी-छोटी खुशियों को, आज बड़े सपनों को तरसता हूँ।

वक्त बदला, हालात बदले, मगर चाहत वही रही,
मंज़िलें बदलती रहीं, मगर हौसलों की राह वही रही।

कल जेब छोटी थी, तो सपनों का आसमान भी छोटा था,
आज आसमान बड़ा है, तो ख्वाबों का कारवाँ भी बड़ा है।

जो मिला, उसे अपना समझकर दिल से स्वीकार किया,
जो नहीं मिला, उसके लिए फिर से प्रयास किया।

वक्त चाहे जितना बदले, उम्मीद का दीप जलता रहेगा,
अमर त्रिपाठी का सफर अभी बाकी है,
कहानी अभी बाकी है, और सपना अभी बाकी है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर