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क़दम क्यों लड़खड़ाते हैं तुम्हारे।

                
                                                         
                            मुहब्बत की कोई तासीर है क्या।
                                                                 
                            
किसी की ये कभी जागीर है क्या।।

वो कब घायल हुआ था जानते हो।
कहीं उनकी नज़र में तीर है क्या।।

किसी की याद में गुमसुम हो ऐसे।
कहीं कुछ मामला गंभीर है क्या।।

क़दम क्यों लड़खड़ाते हैं तुम्हारे।
गले में इश्क़ की जंजीर है क्या।।

तुम्हें देखूं तुम्हें छू लूं कभी मैं ।
मगर ऐसी मेरी तक़दीर है क्या।।
-आलोक रंजन त्रिपाठी
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एक घंटा पहले

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