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कातती है बैठ कर जो चांद पर चरखा

                
                                                         
                            खुशबू से भर गई है हाय मेरी हथेली
                                                                 
                            
छू ली है उंगलियों से मैंने एक चमेली

निकली है गुलशनों में सैर करने के लिये
तितली लग रही है हो फूलों की सहेली

ले रही है लोहा यह हर रोज ग़मों से
जान आलोक की नन्ही एक अकेली

सोचता हूँ देर तक कि इसको क्या कहूँ
कहने वाले कह रहे जीवन है पहेली

कातती है बैठ कर जो चांद पर चरखा
दूर इतनी दूर बुढ़िया किसने धकेली

देख उसके झुमके को मन झूम उठा है
याद यूँही आ रहा है शहर बरेली

रात की तन्हाइयों को सुन के देखना
चूड़ियां खनका रही दुल्हन हो नवेली
-आलोक
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एक घंटा पहले

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