चेहरे पर उमर के ये जो निशान हैं
ये जायेंगे ना लौट के वो मेहमान हैं
लोग लंबे वक़्त से शहर के हो गये
गाँव में कतार से उनके मकान हैं
चुस्कियों फुर्सतों घर सुकून के
चाय की बाजार में जितनी दुकान हैं
आना ही होता एक दिन जमीन पर हमें
सच कहें सब यहाँ मन की उड़ान हैं
जो भी बोलना है मगर सोच समझ कर
आप की ही तरफ तो सबके कान हैं
हो रहा जो यहां मेहर है खुदा की
आलोक हैं कि खामख्वाह परेशान हैं
-आलोक
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