आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जिधर भी इन बादलों के निवास हैं

                
                                                         
                            कहने को यार तो अपने पचास हैं
                                                                 
                            
मगर उनमें एक दो ही ज्यादा खास हैं

अंदाजा दूर पास का लगाओ इस तरह
जो दिल के करीब हैं वो ही पास हैं

महसूस करके देख लेना दिल को थाम के
नाजुक हैं फूल से भी यह जो अहसास हैं

क्वार महीने में अब चल दिये ये
जिधर भी इन बादलों के निवास हैं

आप किसी से भी कभी मिल के देखिये
हर शख्स के यहाँ अपने कयास हैं

कड़वी याद घुल गई उनके जेहन में
आलोक लग रहा है आज फिर उदास हैं
-आलोक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर