नहीं प्रीति का कोई उसका है सानी
मगन श्याम धुन में है मीरा दीवानी
बैठोगे सुनने समझ आयेगा सब
हर घर की होती यहाँ एक कहानी
बनकर सितारा चमकती गगन में
होती नुमाया मुझे मेरी नानी
हो भीड़ में तुम या तन्हाइयों में
रहतीं जेहन में ये यादें पुरानी
क्यों रूप का यूहीं अभिमान करना
ढलती है पल में ही सबकी जवानी
ग़म या खुशी में छलकने को आता
होता अजब ही ये नयनों का पानी
अमावस में कातिक की कौतुक सा बरसे
दीवाली है या ये उजालों की रानी
सदा स्वाद आलोक हर एक तरह के
चखाती कभी ना कभी जिंदगानी
-आलोक
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