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दो जहां की दौलतें ही मिल गईं मुझे

                
                                                         
                            पुकार देखना किसी को इतने प्यार से
                                                                 
                            
झन झना से जायें जैसे उसके तार से

पर तितलियों के रंगने को भोर ही
रंग रेज हो गये खड़े कतार से

दो जहां की दौलतें ही मिल गईं मुझे
माँ ने सर पे हाथ रखा जब दुलार से

मुस्कुरा उठे आखिरी सफ़ा
अबकी दफा माँगना यही बहार से

लग रहा आलोक को क्यों इन दिनों
करीब आ गये दिन त्यौहार के
-आलोक
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5 घंटे पहले

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