दिलों के मैल माँ आंसू से अपने छांट देती है
वो खाई भाइयों के बीच की सब पाट देती है
बड़ों की बात सुन सुनकर बड़ा मैं हो गया लेकिन
अभी भी माँ मुझे बच्चा समझकर डांट देती है
यही तो मामता है, सर्द मौसम क्या बिगाड़ेगा
मेरे कम्बल पे माँ जब शाल अपनी साट देती है
कसैली बात मीठी गोलियों सी चूसते देखा
शिकायत करने वालों को भी ऊंची खाट देती है
बुढ़ापे में दवा कम दो मगर बोलो मुहब्बत से
ये विधवापन को भी बच्चों की ख़ातिर काट देती है
वो माँ है भूख अपनी मार कर उफ़ तक नहीं करती
(मुजाहिद) है वो अपनी रोटियां भी बांट देती है
-आफ़ताब मुजाहिद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X