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भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

                
                                                         
                            इक्कीस बार कीन्ही महि,
                                                                 
                            
क्षत्रिय विहीन राजाओं से।
बाँट दी दौलत उनकी सारी,
महिदेवन्ह को निज हाथों से।।

अन्यायी क्षत्रिय राजाओं का,
था समूल नाश का भाव अभी।
पाय शिष्ट व्यवहार दशरथी राम,
दिया सारंग धनु राघव राम तभी।।

तप लीन हो गये गिरि महेंद्र,
योंही बीत गये हजारों साल।
धीरे धीरे युग त्रेता बीत गया,
अब आ गया था द्वापर काल।।

आ गईं दिवस इक देवि गंगा,
था साथ में उनका पुत्र देवव्रत।
कर रही प्रार्थना अब गंगा थी,
भगवन! शिष्य बना लो देवव्रत।।

यह बालक यदुवंशी क्षत्रिय,
कैसे बना लूँ अपना शिष्य?
भविष्य में बनेगा यह राजा,
अन्यायी पथ पर होगा शिष्य।।
- अशर्फी लाल मिश्र
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11 hours ago

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