मिलना नहीं
मुझे जलन क्यों नहीं होती
क्या मुझे उससे अब मोहब्बत नहीं
उसने इशारे बहुत किए
ये क्या की अब मेरा मन नहीं
जिनके सानिध्य में तरक्कीयो को चूमता
ठोकर सही मगर अब पनाह नहीं
ये मुझको क्या होता जा रहा है
आदमी तो हु मगर इंसान नहीं
उनको रोज ही याद करते है गौतम
ये नाटक क्या की उनसे मिलना नहीं
- ऐ. के .गौतम
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