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एक शाम संभाल रखो

                
                                                         
                            इंसान होना सही है
                                                                 
                            
साथ में थोड़ा ज़मीर रखो
घर में एकता चाहिए तो
पड़ोसियों से बैर रखो
आसां नहीं यहां बुलंदियों को छूना
सफ़र में हो इतना तो ख़्याल रखो
एक हाथ में गुलाब तो दूजे तलवार रखो
मायूसी घेर लेती है पाकर अकेला शख़्स
काफ़िला ना सही दोस्ती का एक ज़र्रा तो रखो
अब वो तुम्हारा नहीं रहा ये तुम्हे पता है
वो अभी भी तुम्हारा ये अफवाह रखो
स्टेशन पर वो बच्चा जो बचपन बेच रहा था
उसकी मेहनत का ठीक ठाक दाम तो रखो
दुःख यूं भाग जाएगा तुम्हे छोड़कर
सर अपना मां की आँचल में रखो
कुएं में दिखाई देने वाला ठंडा चाँद है वो
अचानक सामने आए तो थोड़ी सी हैरत रखो
तुम्हारा दिन कैसे कैसे लोगों के साथ गुजरता है गौतम
एक शाम उसके लिए भी संभाल रखो
- ऐ .के .गौतम
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एक घंटा पहले

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