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सच तुम हो

                
                                                         
                            धोखे और फरेबी के हर अंश में,
                                                                 
                            
कौन कितना और कब तक सच्चा है।

मत पूछना, कोयले पे जलती सांस में,
तनाव के मझधार में, जिस्म के भाव है।

एक बगीचे के फूलों में, बेरंग दाग में,
वह मुर्दा जिस्म से जिता है।

हर रोज अपने सोच के चादर में,
खुद कि आंखे मिठाता है।

रात भर आसमान कि दिवाली में,
हर नई उषा में खुद को गले लगाता है।

जिस्म और टिमटिमाते रस्सी के खिंचा में,
हर अंश झूठा है,

हर रात और गहरे समंदर में,
बस तुम ही, शेष अंश झूठा है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

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