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क्या लिखूँ?

                
                                                         
                            सब कुछ तो लिखा जा चुका, अब मैं क्या लिखूँ
                                                                 
                            
जग की व्यथा लिखूँ या ख़ुद की व्यथा लिखूँ

इंसान में है देवता तो शैतान भी तो है
किसको भला लिखूँ और किसको बुरा लिखूँ

जल रहा है देश अब नफ़रत की आग में
लाशें नहीं है इसां की, हिन्दू या मुसलमां लिखूँ

लुट रही है आबरू मज़हब के नाम पर
मज़हब की है ख़ता या इसां की ख़ता लिखूँ

अजीत मामूली सा आदमी हूँ मैं मामूली सी मेरी बातें
कुछ होता नहीं बड़ा सा तो मैं कैसे बड़ा लिखूँ

अजीत यादव


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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