पुरानी हो गई थी
बरसों पहले
सहेज कर रखी थी
कि पहनूँगा किसी
ख़ास अवसर पर
बाटूँगा ख़ुशियाँ
अपने लोगों के साथ
पर ज़िंदगी के जद्दोजहद
में इस क़दर उलझा कि
कुछ ख़्याल ही न रहा कि
कुछ संभाल कर रखा है
हर शख़्स को ग़मों के सागर
में डूबते उतरते देखा तो
एहसास हुआ कि मुझसे सुखी
तो इस दुनियाँ में कोई नहीं
फिर उस ख़ास अवसर का
इंतज़ार क्यों?
वो तो हमेशा मेरे साथ ही है
यह सोच कर सूटकेस खोला
कि चलो आज ही पहन लेता हूँ
और मनाता हूँ उत्सव
पर अजीत वह सहेजकर रखी गई
शर्ट पड़े पड़े पुरानी हो गई थी
अजीत यादव
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