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मुंतज़िर

                
                                                         
                            जो भी लिखूँ मोहब्बत समझ के पढ़ लेना
                                                                 
                            
मेरे जज़्बातों से क़िस्सा कोई गढ़ लेना

क्या पता किसी मुक़ाम पर रास्ता ठहर जाये
वहाँ से तुम आगे की राह पकड़ लेना

मेरी बुनियाद मेरी हस्ती से जब अलग हो जाये
बिना बताये तुम भी मुझसे बिछड़ लेना

मुंतज़िर हूँ, आख़िरी पायदान पर खड़ा हूँ
एक नज़र देख लेना, जब कुछ सीढ़ी चढ़ लेना

उसुलों से भी कोई ज़िदा रह सकता है?
मेरा छोड़ो, तुम ज़िदगी में आगे बढ़ लेना

फ़क़ीरी के सिवा तुम्हें कुछ आता ही नहीं
अजीत कुछ सबक़ दुनियादारी का भी पढ़ लेना

अजीत यादव

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7 वर्ष पहले

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