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मिज़ाज -ए-शायरी

                
                                                         
                            मिज़ाज-ए-शायरी सी है वो
                                                                 
                            
इक अजनबी सी है वो

जो ज़ुबां पर आकर रूक जाती है
कुछ ऐसी अनकही सी है वो

उसके आगाज़ से काफ़ूर हो अँधेरा
बाख़ुदा रोशनी सी है वो

देखकर अाती है चेहरे पर जो रौनक़
किसी बच्चे की हँसी सी है वो

ज़िदा रहने का मतलब तो है अजीत
वो मिले, ज़िदगी सी है वो

अजीत यादव


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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